Japanese · बौद्ध धर्म

Mu (kōan)

無 (mu)

जोशू का «*मु*» ही उत्तर है — 無, «*नहीं / न / कुछ नहीं*» — जो चीनी गुरु झाओझोउ (जापानी में जोशू) उस भिक्षु को देते हैं, जब वह उनसे पूछता है कि क्या कुत्ते में बुद्ध-प्रकृति है। «*मुमोनकन*» («*बिना द्वार की बाधा*») के अड़तालीस मामलों में पहला, यह ज़ेन का केंद्रीय *कोआन* है: न कोई पहेली जिसे सुलझाना हो, बल्कि विचारशील मन के सामने खड़ी एक दीवार। «*है*» और «*नहीं है*» दोनों वहीं टूट जाते हैं; «*मु*» न तो स्वीकार है, न ही अस्वीकार, बल्कि वह जो मन को थका देता है—जो काटना चाहे, उसे—तब तक, जब तक भेदन न हो जाए।

A monk in all seriousness asked Joshu: “Has a dog Buddha-nature or not?” Joshu retorted “Mu!”
Mumon (Wu-men), Mumonkan (La Barrière sans porte), cas 1, Mumonkan, cas 1 (« Joshu [on the inherent nature of a] dog »). Philip Kapleau (ed.), The Three Pillars of Zen, Anchor/Doubleday, éd. révisée 1989 · trans. Philip Kapleau

मुंडक उपनिषद् के मुमोनकान का पहला प्रसंग दो वाक्यों में समाया है: «एक भिक्षु ने अत्यंत गंभीरता से जोशू से पूछा: “क्या कुत्ते में बुद्ध-प्रकृति है या नहीं?” जोशू ने तपाक से उत्तर दिया—‘मू!’» — एक भिक्षु ने जोशू से अत्यंत गंभीरता से पूछा: «क्या कुत्ते में बुद्ध-प्रकृति है या नहीं?» जोशू का उत्तर था: «मू!» अक्षर 無 का शाब्दिक अर्थ है «नहीं», «न-होना», «शून्य»। पर यह प्रश्न का उत्तर नहीं है।

क्योंकि प्रश्न ही फंदा है। निर्वाण सूत्र सिखाता है कि हर संवेदनशील प्राणी—मनुष्य, पशु, पौधा—में बुद्ध-प्रकृति होती है। यदि जोशू कहता «है», तो वह धर्मग्रंथ की रट लगा रहा होता; «नहीं है» कहता, तो धर्म का खंडन करता। व्याख्याता यासुतानी-रोशी ने अपने भाष्य (तेशो) में, जिसे फिलिप कपलियु ने उद्धृत किया है, इसे साफ़ शब्दों में कहा: «चाहे जो उत्तर हो, दोनों ही बेतुके होंगे», क्योंकि «सब कुछ ही बुद्ध-प्रकृति है», इसलिए हाँ या ना में काटना बात को चूकना है। «मू» का संबंध «बुद्ध-प्रकृति के होने या न होने से नहीं है—वह स्वयं ही बुद्ध-प्रकृति है»: वह इस बात पर नहीं टिकता कि बुद्ध-प्रकृति है या नहीं—वह स्वयं बुद्ध-प्रकृति है।

यहीं से मुमोन (वू-मेन) की चेतावनी आती है, जो इस संकलन के संग्रहकर्ता हैं, कपलियु के हवाले से: «मू को शून्यता मत समझो, न ही उसे अस्तित्व या अनस्तित्व के रूप में ग्रहण करो।» मू को शून्य मत बनाओ, न उसे सत् या असत् के रूप में सोचो। उसे «आग में तपे लोहे के गोले की तरह» धारण करना है— «जिसे न निगला जा सके, न उगला»—जब तक भीतर और बाहर एक न हो जाएँ। यही बाधा है: «यह मू है, परम शिक्षा की एकमात्र रुकावट।» एक कोआन जो एक हाथ की ताली से भिन्न है— «न बुद्धि को उकसाता है, न कल्पना को»— «ठंडा पड़ा रहता है» दोनों से परे। तर्क उस पर कोई पकड़ नहीं पाता; वह उसमें व्यर्थ घिसता है, और इसी गतिरोध में प्रकाशन का, जागरण का द्वार खुल सकता है। मू वही तार खींचता है जो अमन का है: वह मन को विवेक से स्वयं को थामने से रोकता है।

मू-कोआन ≠ ताओवादी वू। एक ही अक्षर—無—पर अलग क्रिया। लाओ-त्से का वू सत् पर एक स्थापना है: «उर्वर शून्य», धुरी का खोखलापन जिससे उपयोग जन्मता है, अनुपस्थिति जिससे कार्य होता है। जोशू का मू वास्तविकता पर कुछ भी नहीं कहता; वह विचार के सामने एक दीवार खड़ी कर देता है जो निष्कर्ष पर पहुँचना चाहता है।

मू-कोआन ≠ तार्किक पहेली। पहेली का एक हल होता है जिसे सूक्ष्म तर्क से पकड़ा जा सकता है। «मू तर्क और विवेक के लिए पूर्णतः अभेद्य है»: उसका कोई उत्तर नहीं खोजना है, वह इसलिए बना है कि विचार थककर हाथ छोड़ दे।

मू-कोआन ≠ निहिलवादी निषेध। मू «कुछ नहीं» नहीं है जो मिटा दे, न यह घोषणा है कि «कुत्ते में बुद्ध-प्रकृति नहीं है»—मुमोन साफ़ कहता है कि उसे शून्य मत समझो। वह जगत को मिटाता नहीं: वह बुद्ध-प्रकृति को «एक विशेष वस्तु» के रूप में देखना बंद कर देता है «जो है या नहीं है»। यहाँ वह शून्यता के निकट है, जो शून्य नहीं, «स्वभाव की अनुपस्थिति» है।

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