लालसा की जड़
धम्मपद लालसा को लता की तरह उखाड़ फेंकता है ; स्पिनोज़ा इच्छा को मनुष्य का सार मानता है। उखाड़ना, या समझना — दोनों मार्ग एक ही बंधन से मुक्ति के लिए : और न खींचा जाना।
वर्षा सोने की हो, तो भी प्यास नहीं बुझती। धम्मपद इस तथ्य को बिना किसी भावुकता के रखता है : «सोने की वर्षा भी भोगों की प्यास नहीं बुझा सकती।» जो भरता है, वह कभी पूरा नहीं होता ; जो पोषित होता है, वह बढ़ता ही जाता है। फर्नां हू के अनुवाद में चौबीसवाँ अध्याय इसी गति पर केंद्रित है, जिसे वह कभी «प्यास» नहीं कहता, बल्कि लालसा कहता है, और जिसे वह शुरू से अंत तक एक ही बिंब से व्यक्त करता है : एक पौधा जो फैलता जाता है।
जैसे जड़ अक्षुण्ण रहने पर रसभरा वृक्ष कटने पर भी बार-बार उग आता है, वैसे ही जब तक लालसा की प्रवृत्ति उखाड़ी नहीं जाती, दुःख का यह कारण बार-बार लौट आता है।
यह बिंब सब कुछ तय कर देता है। लालसा «लता की तरह फैलती है» ; वह मनुष्य को «वन में फल के पीछे दौड़ते बंदर की तरह इधर-उधर भटकाती है»। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी एक जड़ है। पेड़ काटा जा सकता है — किसी वस्तु का त्याग किया जा सकता है, किसी प्रलोभन से बचा जा सकता है — पर जब तक जड़ बनी रहती है, वह फिर उग आता है। इसलिए ग्रंथ छाँटने की नहीं, उखाड़ने की सलाह देता है : «जैसे ही तुम्हें यह लता उगती दिखाई दे, उसे प्रज्ञा के बल से उखाड़ दो।»
धम्मपद में लालसा किसे कहते हैं ?
न कि किसी इच्छित वस्तु को, बल्कि चिपकने की गति को ही — वह प्रवाह «जिसे उन्होंने स्वयं रचा है, जैसे मकड़ी अपना जाल बुनती है»। पालि भाषा में इसे तण्हा कहते हैं, प्यास : इसे पीने से नहीं बुझाया जा सकता, इसे स्रोत को सुखाकर ही मिटाया जा सकता है। दी गई राह इस क्रिया को अंत तक ले जाती है — किसी दोष को सुधारना नहीं, बल्कि जड़ को उखाड़ना, ताकि अंत में कोई प्यास शेष न रहे। तब «दुःख धीरे-धीरे उससे छूट जाता है, जैसे कमल के पत्ते से जल की बूँदें टपकती हैं»।
एम्स्टर्डम के एक दार्शनिक एक बिल्कुल अलग राह सुझाते हैं — यहाँ तक कि वे पहले कदम को ही अस्वीकार कर देंगे। स्पिनोज़ा के लिए इच्छा मनुष्य में उगी कोई खरपतवार नहीं है : वह स्वयं मनुष्य है।
इच्छा मनुष्य का वही स्वरूप है, जिसे किसी भी दिए हुए आवेग द्वारा कुछ करने के लिए प्रेरित माना जाता है।
यहाँ इच्छा कोई ऐसी दुर्घटना नहीं है जिससे मुक्ति पाई जा सके : वह «स्वयं के प्रति सजग» भूख है, वह धक्का है जिससे प्रत्येक प्राणी अपने अस्तित्व में बने रहने का प्रयत्न करता है। स्पिनोज़ा उस क्रम को उलट देते हैं जिसे हम स्वाभाविक मानते हैं : «हम किसी वस्तु के लिए प्रयत्न नहीं करते, न उसे चाहते हैं, न उसकी भूख रखते हैं, न उसकी इच्छा करते हैं, क्योंकि हम उसे अच्छा समझते हैं ; बल्कि इसके विपरीत, हम किसी वस्तु को इसलिए अच्छा समझते हैं क्योंकि हम उसकी ओर प्रयत्न करते हैं।» इच्छा हमारी अच्छाई की धारणा का अनुसरण नहीं करती ; वह उसे पहले से तय करती है और उसका आधार बनती है। इस जड़ को उखाड़ना पूरे वृक्ष को काट देना होगा — क्योंकि इस बार वृक्ष स्वयं हम हैं।
दोनों क्रियाएँ रास्ते में नहीं मिलतीं। धम्मपद बुझाने की सलाह देता है, स्पिनोज़ा समझने की। एक लालसा को पराई जड़ मानता है, जिसे उखाड़ना है ताकि कुछ भी न उगे ; दूसरा इच्छा को स्वयं रस मानता है, जिसे काटने से स्वयं का नाश होता है। जहाँ पहला समाप्ति का लक्ष्य रखता है, वहाँ दूसरा इच्छा का अंत नहीं जानता — केवल उसके स्रोत का परिवर्तन। क्योंकि स्पिनोज़ा के अनुसार जो दास बनाता है, वह इच्छा नहीं है, बल्कि निष्क्रिय इच्छा है : वह जो अपर्याप्त विचारों से जन्म लेती है और बाहरी कारणों से खिंचती है, जिससे «मनुष्य इधर-उधर खींचा जाता है और नहीं जानता कि किस ओर मुड़े»। इसके विपरीत वह इच्छा है जो विवेक से जन्मती है, जो केवल हमारी समझने की शक्ति से प्रवाहित होती है, और जिसके बारे में वे कहते हैं : «इसका कोई आधिक्य नहीं हो सकता»।
फिर भी दोनों ग्रंथ एक ही दासता की बात करते हैं। देखिए वे मनुष्य जिन्हें वे वर्णित करते हैं। धम्मपद : लालची «इधर-उधर दौड़ता है, जैसे शिकार किया गया खरगोश»। स्पिनोज़ा : «मनुष्य इधर-उधर खींचा जाता है और नहीं जानता कि किस ओर मुड़े»। वही शरीर चारों ओर से खिंचा जा रहा है, वही विश्रामहीन दौड़ — इच्छा की अधिकता से नहीं, बल्कि इसलिए कि इच्छा एक अदृश्य बाहरी स्रोत से आती है : अज्ञान से पोषित तृष्णा, वह प्रभाव जो हम भोगते हैं। दोनों ज्ञान एक ही दौड़ को रोकने का वादा करते हैं। वे एक ही शिखर पर नहीं चढ़ते — समस्त प्यास का शमन सक्रिय आनंद नहीं है जो समझता है — पर वे एक ही दासता से मुक्त करते हैं : अब और खिंचे न जाना, जिसे हम पहचान नहीं पाते। एक स्रोत को सुखा देता है ताकि कुछ न उगे ; दूसरा उसे प्रकाशित करता है ताकि इच्छा शिकार से नहीं, स्वयं से जन्मे। उखाड़ना, या समझना : एक ही रस्सी पर विपरीत हाथ, ताकि खिंचा जाना बंद हो।
एक प्रश्न बचता है, जिसे न उखाड़ना सुलझाता है, न समझना — और जो प्रत्येक के भीतर उठता है, उस गुप्त प्रेरणा के सामने जो उसे सुबह उठाती है : यह प्यास जो मुझे जगाती है, क्या वह मुझे ले जाती है, या मेरा पीछा करती है ?
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उद्धृत स्रोत
- trad. attribuée à Bouddha, Dhammapada, सं. Ernest Leroux, 1878 (Bibliothèque orientale elzévirienne, XXI), अनु. Fernand Hû.
- Baruch Spinoza, Éthique, सं. Wikisource (trad. Charles Appuhn, 1913), अनु. Charles Appuhn.