आवासित मौन
अर्सेन को जीवन की नींव रखने के लिए तीन शब्द मिलते हैं — पलायन, मौन, विश्राम में ठहरना ; धम्मपद याद दिलाता है कि केवल चुप्पी से ज्ञानी नहीं बनता। सच्चा मौन कोलाहल का अभाव नहीं, एक अवस्था है।
जिस आवाज़ को सुनने वाला व्यक्ति परमार्थ की खोज में लगा कोई नवागत नहीं है।
अर्सेन शाही दरबार में शिक्षक है, सम्मानों से लदा हुआ, संसार के कोलाहल के केंद्र में स्थित। वह प्रार्थना करता है कि उसे दिखाया जाए कि उसका उद्धार किस मार्ग से होता है। उत्तर न तो बहस करता है, न ही व्याख्या — वह तीन क्रियाओं में समाया हुआ है, और हर क्रिया कुछ न कुछ काटती है।
अर्सेन, मनुष्यों से पलायन कर, मौन धारण कर और विश्राम में ठहर : ये वे प्रथम आधार हैं जिन्हें तुम्हें अपने उद्धार के भवन की नींव रखने के लिए डालना चाहिए।
तीन क्रमिक क्रियाएँ। पलायन बाहर को काटता है — यह अनाखोरेसिस है, मरुभूमि की ओर प्रस्थान। मौन वाणी को काटता है। विश्राम भीतर की व्याकुलता को भी काट डालता है। लैटिन परंपरा ने इस सूत्र को तीन शब्दों में संक्षिप्त कर दिया — fuge, tace, quiesce : भाग, चुप रह, विश्राम कर। मरुभूमि यहाँ मौन को एकांत का परिणाम या उसकी शांत उपज नहीं मानता ; यह एक पृथक अनुशासन है, जो पलायन के बाद और विश्राम से पहले आता है, जैसे भवन खड़ा करने से पहले एक आधार रखा जाता है।
और वह आवाज़ उनके स्थान को स्पष्ट करती है : प्रथम आधार। न कि भवन, बल्कि वह जिस पर भवन खड़ा होता है। मरुभूमि का मौन इसलिए खोज का विषय नहीं ; वह उसकी शर्त है। मनुष्य मौन के लिए नहीं हटता, वह हटता है ताकि कुछ और घटित हो सके — एक श्रवण, एक उपस्थिति। यह मौन शून्य की ओर उन्मुख नहीं, किसी की ओर है। वह कक्ष जहाँ अर्सेन अपना द्वार बंद करता है, संसार के विरुद्ध कोई घेरा नहीं ; यह एक कमरा है जहाँ वह प्रतीक्षा करता है कि कोई उससे मिलने आए। जहाँ आंतरिक एकांत स्टोइक के लिए आत्मा में समाया रहता है बिना शरीर की स्थिति बदले, वहीं भिक्षु का एकांत एक वास्तविक विस्थापन है, एकाकीपन की ओर उठाया गया एक क़दम।
क्या मौन से ज्ञानी बना जा सकता है ?
नहीं — और यह बात एक दूसरी परंपरा सबसे स्पष्ट रूप से कहती है। धम्मपद केवल मौन को ज्ञानी बनाने की शक्ति देने से इनकार करता है। चुप रहना मात्र एक बाहरी रूप है ; यदि मन अशांत और अज्ञानी बना रहे, तो मौन केवल विकार को ढकता है, उसे मिटाता नहीं। ज्ञान की कसौटी कहीं और है : उसमें जो तौला गया, भेद किया गया, चुना गया।
केवल मौन से अशांत और अज्ञानी व्यक्ति मुनि नहीं बन जाता। सब कुछ तौलकर श्रेष्ठ भाग चुन लेने वाला, बुराई से दूर रहने वाला ज्ञानी — वही मुनि है।
इसी अध्याय में इसे दूसरे कोण से भी कहा गया था : «बहुत बोलने से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता»। न शब्दों की बाढ़, न उनका अभाव आत्मा की माप बताता है। मुनि — जिसका नाम ही मौन का द्योतक है — वह नहीं है जिसने मुँह बंद कर लिया हो, बल्कि वह जिसने अपने मन को संतुलन में रखा, «वस्तुओं के दोनों पक्षों» को देखा और भलाई की ओर झुक गया। उसका मौन आंतरिक स्थिरता का परिणाम है, उसका कारण नहीं।
दो मौन, जिन्हें पहले अलग रखना है फिर निकट लाना। अर्सेन का मौन किसी की ओर पलायन है : मनुष्यों, वाणी, व्याकुलता को काटकर वह उस ईश्वर के लिए उपलब्ध हो जाता है जो आत्मा के मौन होने पर बोलता है। यहाँ मौन एक आधार है जिसे रखना है, एक कर्म, भवन निर्माण का पहला क़दम। मुनि का मौन किसी से पलायन नहीं करता और न ही किसी आवाज़ की प्रतीक्षा ; वह मन की वह अवस्था है जिसने भीतर की तृष्णा और विभाजन को शांत कर दिया है, और इसलिए मौन है क्योंकि अब कुछ भी उसे हिलाता नहीं। एक निर्माण करता है, दूसरा शांत होता है। एक किसी की ओर मुड़ता है, दूसरा स्वयं में समाहित हो जाता है।
पर यहाँ दोनों मार्ग एक-दूसरे से मिलते हैं, बिना एकाकार हुए। दोनों में से कोई भी मौन को केवल वाणी के अभाव के रूप में नहीं लेता। अर्सेन का «मौन धारण कर» उसके बाद आने वाले «विश्राम में ठहर» से अविभाज्य है : मुँह बंद कर लेने से कुछ नहीं होता यदि भीतर का कोलाहल जारी रहे ; मौन करना है तो व्याकुलता को, और रुकी हुई वाणी उसका केवल बाहरी चिह्न है। धम्मपद भी दूसरी ओर से यही कहता है : अशांत मनुष्य का मौन ज्ञानी नहीं बनाता। दोनों ओर, मुक्ति देने वाला मौन कोई रिक्तता नहीं, एक अवस्था है — आत्मा की एक गुणवत्ता, शोर की मात्रा में कमी नहीं। खाली मौन कहीं नहीं ले जाता ; केवल आवासित मौन ही मायने रखता है, वह जिसके भीतर कुछ है, या कोई।
अर्सेन अपना द्वार बंद करता है, मुनि अपने मन को संतुलन में रखता है : एक ही दहलीज़ पर पहुँचने के दो तरीके। मौन वहाँ कभी अभाव नहीं है। वह बचा हुआ है जब बाक़ी सब चुप हो जाता है।
उद्धृत स्रोत
- Pères du désert (saint Arsène), Vies choisies des Pères des déserts d'Orient, सं. Ad Mame et Cie, 1861 (compilation de Michel-Ange Marin), अनु. Arnauld d'Andilly.
- Dhammapada (attrib. Bouddha), Dhammapada, सं. Ernest Leroux, 1878, अनु. Fernand Hû.