माया और उसका पारगमन : स्वतंत्रता के तीन मार्ग

इच्छा, विद्रोह, परस्पर-निर्भरता — शोपेनहावर, कामू और दोगेन के अनुसार अहं और जगत की माया

माया और उसका पारगमन : स्वतंत्रता के तीन मार्ग
कान्जुरो शिबाता XX 'एन्सो (円相)' — एन्सो। विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY-SA 3.0.

स्वतंत्रता कोई अवस्था नहीं, एक गति है। उसे प्राप्त नहीं किया जाता, उसे पार किया जाता है। तीन स्वर इसके रूपरेखा को नकारात्मक ढंग से रेखांकित करते हैं : यह नहीं कि वह क्या है, बल्कि वह किससे मुक्त करती है। शोपेनहावर के लिए माया सबसे पहले अहं की है — वह रंगमंच जहाँ वे इच्छाएँ अभिनीत होती हैं जो हमें बाँधती हैं। कामू के लिए वह सामाजिक है — एक ऐसा आवरण जो संसार की निरर्थकता पर विश्व की महत्वाकांक्षाओं द्वारा डाला गया है। दोगेन के लिए वह पारिस्थितिक है — जीवंत के साथ अपनी परस्पर-निर्भरता को भूल जाना। प्रत्येक एक निकास सुझाता है : निषेध, विद्रोह, विघटन। उनके मार्ग भिन्न हैं, परंतु उनका आरंभ बिंदु एक ही है — माया को उसके वास्तविक रूप में पहचानना।

शोपेनहावर : इच्छा के रूप में माया और निषेध के रूप में स्वतंत्रता

शोपेनहावर स्वतंत्रता की नहीं, सुख की बात करते हैं। फिर भी, यह एक मुक्ति की ही बात है। उनके जीवन में बुद्धिमत्ता के सूत्रों में सुख कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि उन स्थितियों के विघटन का एक सह-प्रभाव है जो हमें दुखी बनाती हैं। ये स्थितियाँ व्यक्तिगत हैं, और उनमें शारीरिक और बौद्धिक गुणों का विशेष स्थान है।

इस पूरे विवेचन में, जो उन व्यक्तिगत स्थितियों पर केंद्रित है जो हमारे सुख में योगदान करती हैं, मैंने शारीरिक गुणों और मुख्यतः बौद्धिक गुणों को ध्यान में रखा है।
Arthur Schopenhauer, Aphorismes sur la sagesse dans la vie  — सं. फ़्रेंच अनुवाद के आधार पर, अनुवादक : ज्यां-एलेक्सांद्र कांताकुज़ेन, trad. viasophia
ये गुण तटस्थ नहीं होते : वे हमारी इच्छाओं की तीव्रता और प्रकृति को निर्धारित करते हैं। जितनी तीक्ष्ण बुद्धि होगी, उतनी ही जटिल इच्छाएँ होंगी, और उतना ही गहरा उनका असंतोष। यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ उन्हें तृप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें कम करना है।

शोपेनहावरीय माया आध्यात्मिक है। वह इस विश्वास में निहित है कि अहं एक स्वायत्त सत्ता है, जो संतुष्टियों के संचय द्वारा स्वयं को साकार कर सकती है। परंतु अहं इच्छाओं का एक समूह मात्र है, और ये इच्छाएँ अनंत हैं। उन्हें पूरा करने का प्रयास एक अंतहीन दौड़ में शामिल होना है। इसलिए बुद्धिमत्ता अहं की पुष्टि में नहीं, बल्कि उसकी सीमा में है। शोपेनहावर क्रिया की नैतिकता नहीं, संयम की नैतिकता प्रस्तावित करते हैं। स्वतंत्रता तब आती है जब इच्छा सूख जाती है — बल द्वारा नहीं, बल्कि स्पष्टता द्वारा। यह समझना कि सुख इच्छा के विषय में नहीं, बल्कि इच्छा के अभाव में है, पहले से ही उससे मुक्ति है।

यह निषेध निष्क्रिय त्याग नहीं है। वह सक्रिय है, क्योंकि वह संसार को वैसा देखने की माँग करता है जैसा वह है : एक ऐसा स्थान जहाँ दुख नियम है, और सुख अपवाद। बौद्धिक गुण इस सत्य को उजागर करके दुख को तीव्र करते हैं, परंतु वे उसे पार करने का मार्ग भी प्रदान करते हैं। शोपेनहावरीय स्वतंत्रता इसलिए ज्ञान द्वारा मुक्ति है — अमूर्त ज्ञान नहीं, बल्कि एक साकार ज्ञान, जो इस बात को बदल देता है कि हम संसार में कैसे निवास करते हैं।

कामू : महत्वाकांक्षा के रूप में माया और विद्रोह के रूप में स्वतंत्रता

कामू सुख की नहीं, जीवन की बात करते हैं। और सिसिफस का मिथक में जीवन सबसे पहले एक स्पष्टता का प्रश्न है। उनके द्वारा खंडित की गई माया आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक है। वह महत्वाकांक्षा का रूप लेती है — “एक महानतर जीवन की ओर अग्रसर होने का मार्ग”, जो वास्तव में हमें एकमात्र महत्वपूर्ण वस्तु से विमुख कर देता है : वर्तमान क्षण।

विजेता महत्वाकांक्षा की ओर मोड़ दिया जाएगा, जो महज़ एक महानतर जीवन की ओर ले जाने वाला मार्ग था।
Albert Camus, Myth of Sisyphus  — सं. अंग्रेज़ी मूल के आधार पर, trad. viasophia
महत्वाकांक्षा एक जाल है, क्योंकि वह एक भविष्य की पूर्णता का वादा करती है जो कभी नहीं आएगी। वह आधुनिक समाजों का इंजन है, परंतु साथ ही उनका मूलभूत झूठ भी।

कामू के लिए स्वतंत्रता इच्छा के निषेध से नहीं, बल्कि उसके पुनर्निर्देशन से आती है। महत्वाकांक्षा एक माया है क्योंकि वह मानती है कि सुख कहीं और है, एक सदा टलते भविष्य में। विद्रोह, इसके विपरीत, उपस्थिति का कार्य है। वह उन आख्यानों को अस्वीकार करने में निहित है जो हमें पराधीन करते हैं — सफलता, प्रगति, पारलौकिकता के आख्यान — ताकि वर्तमान के मूल्य की पुष्टि की जा सके। सिसिफस, जिसे अनंत काल तक अपना पत्थर लुढ़काने की सज़ा मिली है, तब स्वतंत्र होता है जब वह अपनी स्थिति को स्वीकार कर लेता है। उसकी स्वतंत्रता कार्य की पूर्ति में नहीं, बल्कि उसकी चेतना में है। इसी प्रकार, निरर्थक मनुष्य तब स्वतंत्र होता है जब वह अस्तित्व से परे किसी अर्थ की खोज बंद कर देता है और क्षण में ही उसे रचता है।

यह स्वतंत्रता राजनीतिक है, क्योंकि वह उन संरचनाओं को अस्वीकार करने का आह्वान करती है जो हमें कैद करती हैं। महत्वाकांक्षा एक सामूहिक माया है, एक ऐसा प्रलोभन जो व्यक्तियों को आज्ञाकारी बनाए रखता है। विद्रोह, इसके विपरीत, एक अकेला कार्य है जो व्यापक होने पर सामूहिक हो जाता है। वह शोपेनहावर की भाँति शुद्ध निषेध नहीं है, बल्कि एक विरोधाभासी पुष्टि है : जीवन के मूल्य की पुष्टि उन झूठों को अस्वीकार करके जो उसे नकारते हैं। कामू समर्पण की नैतिकता नहीं, बल्कि स्पष्टता की नैतिकता प्रस्तावित करते हैं। स्वतंत्रता तब आती है जब संसार के वादों पर विश्वास करना बंद कर दिया जाता है और नए वादों का आविष्कार किया जाता है।

कामू की माया इसलिए सामाजिक है, परंतु उसमें एक आध्यात्मिक आयाम भी है। महत्वाकांक्षा एक आगे भागना है, अस्तित्व की मूलभूत निरर्थकता से बचने का एक तरीका। विद्रोह, इसके विपरीत, उसे आलिंगन करने का एक तरीका है। वह निरर्थकता को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे एक शक्ति में बदल देता है। यहाँ स्वतंत्रता इच्छा के निषेध में नहीं, बल्कि उसके पुनर्ग्रहण में है। वह संसार को वैसा देखने की माँग करती है जैसा वह है — बिना ईश्वर, बिना नियति, बिना पूर्वनिर्धारित अर्थ के — और उसमें कार्य करने का एक कारण ढूँढ़ने की।

दोगेन : पृथक्करण के रूप में माया और विघटन के रूप में स्वतंत्रता

दोगेन न तो सुख की बात करते हैं, न जीवन की, बल्कि मार्ग की। और शोबोगेंज़ो में मार्ग एक अभ्यास है। उनके द्वारा खंडित की गई माया न तो आध्यात्मिक है, न सामाजिक, बल्कि पारिस्थितिक है। वह इस विश्वास में निहित है कि अहं जीवंत के शेष से पृथक एक सत्ता है। यह माया सबसे प्राचीन और सबसे दृढ़ है, क्योंकि वह हमारे संसार से संबंध को संरचित करती है।

अपना काषाय पहनकर नियमित रूप से ज़ज़ेन करो। इस जन्म में काषाय धारण करने से अगले दूसरे जन्म में मार्ग की प्राप्ति का एक पूर्व उदाहरण है।
Dogen, dogen-shobogenzo-treasury-true-dharma-eye-tanahashi  — सं. अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर, अनुवादक : काज़ तनहाशी, trad. viasophia
काषाय, यह भिक्षु का वस्त्र, महज़ एक प्रतीक नहीं है। वह एक अभ्यास है, एक ऐसी निरंतरता में स्वयं को अंकित करने का तरीका जो व्यक्ति से परे है। दोगेन के लिए स्वतंत्रता अहं की पुष्टि में नहीं, बल्कि जीवंत की परस्पर-निर्भरता में उसके विघटन में है।

दोगेनीय माया पृथक्करण की है। वह एक ऐसे अहं का रूप लेती है जो स्वयं को स्वायत्त मानता है, जबकि वह अनगिनत अंतःक्रियाओं का परिणाम है — अन्य प्राणियों के साथ, पृथ्वी के साथ, समय के साथ। ज़ज़ेन, बैठकर ध्यान, विघटन का एक अभ्यास है। उसका उद्देश्य अहं को मिटाना नहीं, बल्कि उसे एक व्यापक जाल में स्थित करना है। नियमित रूप से पहना जाने वाला काषाय इस परस्पर-निर्भरता की याद दिलाने का एक तरीका है। वह वस्त्र नहीं, एक नई त्वचा है, संसार को धारण करने का एक ढंग।

यहाँ स्वतंत्रता शोपेनहावर की भाँति इच्छा के निषेध में नहीं है, न कामू की भाँति उसके पुनर्निर्देशन में। वह इस बोध में है कि अहं कोई कारागार नहीं, बल्कि एक मार्ग है। दोगेन द्वारा उल्लिखित “अगला दूसरा जन्म” पुनर्जन्म का वादा नहीं, बल्कि निरंतरता की एक रूपक है। स्वतंत्रता तब आती है जब व्यक्ति एक व्यक्तिगत अस्तित्व से पहचान करना बंद कर देता है और एक व्यापक प्रवाह में स्वयं को अंकित कर लेता है। वह किसी चीज़ से मुक्ति नहीं है, बल्कि किसी चीज़ में मुक्ति है — परस्पर-निर्भरता में, समय में, जीवंत में।

यह स्वतंत्रता पारिस्थितिक है, क्योंकि वह संसार के साथ मेल-मिलाप की माँग करती है। वह पलायन नहीं, बल्कि एक डूबना है। ज़ज़ेन पलायन नहीं, बल्कि अस्तित्व के हृदय में स्थित होने का एक तरीका है। दोगेन निषेध या विद्रोह की नैतिकता नहीं, बल्कि उपस्थिति की नैतिकता प्रस्तावित करते हैं। यहाँ स्वतंत्रता स्वीकार में है — निष्क्रिय स्वीकार नहीं, बल्कि सक्रिय स्वीकार, जो इस बात को बदल देता है कि हम संसार में कैसे निवास करते हैं।

साझा शिखर : आवरण के रूप में माया और पारगमन के रूप में स्वतंत्रता

तीन मायाएँ, तीन मार्ग। शोपेनहावर इच्छा को पराधीनता का स्रोत मानते हैं, कामू महत्वाकांक्षा को, दोगेन पृथक्करण को। फिर भी, उनके प्रस्ताव एक बिंदु पर अभिसरित होते हैं : स्वतंत्रता अहं की पुष्टि में नहीं, बल्कि उसके पारगमन में है। शोपेनहावर के लिए वह इच्छा के निषेध में है; कामू के लिए सामाजिक मायाओं के विरुद्ध विद्रोह में; दोगेन के लिए अहं के परस्पर-निर्भरता में विघटन में। प्रत्येक संसार को वैसा देखने का एक तरीका प्रस्तावित करता है जैसा वह है — उन आवरणों के बिना जो हमें उससे अलग करते हैं।

तीनों के यहाँ माया एक आवरण है। शोपेनहावर के लिए वह माया का आवरण है, वह आभास जो हमें यह विश्वास दिलाता है कि सुख इच्छाओं की तृप्ति में है। कामू के लिए वह सामूहिक महत्वाकांक्षाओं का आवरण है, जो हमें अस्तित्व की मूलभूत निरर्थकता भुलवा देता है। दोगेन के लिए वह अहंकार का आवरण है, जो हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम जीवंत के शेष से पृथक हैं। तीनों ही स्थितियों में स्वतंत्रता उस कर्म में है जो इस आवरण को फाड़ देता है।

यह कर्म एक जैसा नहीं है। शोपेनहावर बौद्धिक तपस्या का प्रस्ताव करते हैं, इच्छाओं से ज्ञान द्वारा अलग होने का एक तरीका। कामू अस्तित्वगत विद्रोह का प्रस्ताव करते हैं, संसार के झूठों को अस्वीकार करके नए झूठों का आविष्कार करने का एक तरीका। दोगेन शारीरिक अभ्यास का प्रस्ताव करते हैं, एक ऐसे निरंतरता में स्वयं को अंकित करने का तरीका जो व्यक्ति से परे है। फिर भी, इन कर्मों में एक साझा संरचना है : वे माया को उसके वास्तविक रूप में देखने और उसे पार करने की माँग करते हैं।

यहाँ स्वतंत्रता कोई अवस्था नहीं, एक गति है। वह गंतव्य में नहीं, पारगमन में है। शोपेनहावर, कामू और दोगेन मुक्ति का कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि एक अभ्यास प्रस्तावित करते हैं। एक के लिए वह निषेध है; दूसरे के लिए विद्रोह; तीसरे के लिए विघटन। परंतु तीनों ही स्थितियों में वह उन मायाओं से मुक्त होने की बात है जो हमें पराधीन करती हैं — किसी अन्य लोक तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि इस लोक में पूर्णतः निवास करने के लिए।

उद्धृत स्रोत

  • Arthur Schopenhauer, Aphorismes sur la sagesse dans la vie, सं. , अनु. Jean-Alexandre Cantacuzène.
  • Albert Camus, Myth of Sisyphus, सं. .
  • Dogen, dogen-shobogenzo-treasury-true-dharma-eye-tanahashi, सं. .