प्रकृति एक विषय के रूप में : तीन स्वर, एक सीमा

प्रभुत्व, पारस्परिकता, विलयन — द्वैतवाद का अनचिंतित पक्ष

प्रकृति एक विषय के रूप में : तीन स्वर, एक सीमा
अमीर ख़ुसरो दहलवी — 'नीले मंडप की राजकुमारी की कथा : रूम के युवक का एक परी और उसकी सखियों द्वारा बाग में स्वागत', अमीर ख़ुसरो दहलवी के ख़म्सा (पंचकाव्य) से पृष्ठ (१५९७–९८)। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, CC0.

प्रकृति को कोई भी शब्द समेट नहीं सकता, उसे केवल सीमित कर सकता है। वस्तु, विषय, प्रवाह — ये श्रेणियाँ मात्र उसी चिंतन के चिह्न हैं जो उससे टकराता है या उसमें विलीन हो जाता है। यहाँ तीन प्रस्ताव खड़े होते हैं, जिनका कोई समाधान नहीं : एक उसे वैध उपकरण बनाता है, दूसरा अस्तित्वों के गुणों का जाल, तीसरा शून्य की वह खिलावट जहाँ अहं मिट जाता है। प्रत्येक अपने साथ एक तत्त्वमीमांसा, एक विश्व-संबंध, एक नीति लेकर आता है। कोई भी दूसरे में समा नहीं सकता। फिर भी, इनके साथ-साथ रखने से ही एक ऐसा प्रश्न उठता है जो इनसे परे है — द्वैतवाद की सीमा का प्रश्न, जिसे लाँघा जाए या मिटाया जाए।

प्रकृति एक जीवित उपकरण के रूप में : प्रभुत्व की वैधता

जिस प्रकार वे हैं, उसी प्रकार दास एक जीवित उपकरण है; और चूँकि नगर और शहर उन उपकरणों के बिना नहीं रह सकते जो उनके लिए अनिवार्य हैं, इसलिए दासता वैध है, दासता स्वाभाविक है, ठीक वैसे ही जैसे जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अर्जन।

Aristote, La Politique , पुस्तक La Politique  — सं. फ़्रेंच अनुवाद जूल्स बर्थेलेमी-सेंट-हिलेर के अनुसार, ३रा संशोधित संस्करण, पेरिस, १८७४ (गालिका/बीएनएफ़), trad. viasophia

प्रकृति कोई सहभागी नहीं, बल्कि एक साधन है। वह उन वस्तुओं से एकाकार हो जाती है जिनकी नगर को जीवित रहने के लिए आवश्यकता है, और ये वस्तुएँ, बदले में, उन उपकरणों से एकाकार हो जाती हैं जो उन्हें प्राप्त करने में सहायक होते हैं। यहाँ दास कोई रूपक नहीं है : वह स्वयं उस संबंध का प्रतिमान है जो मनुष्य अपने आसपास की दुनिया के साथ रखता है। एक जीवित उपकरण — अर्थात् एक ऐसा औज़ार जो साँस लेता है, शायद पीड़ा भी सहता है, परंतु उसकी पीड़ा उसके उपयोग में बाधा नहीं बनती। बल्कि, वह उसकी शर्त है : एक ऐसा औज़ार जो पीड़ा न सहे, वह जीवित नहीं होगा, और इसलिए पूर्णतः प्रभावी भी नहीं होगा।

यह प्रस्ताव केवल दासता को न्यायोचित नहीं ठहराता। वह एक ऐसी तत्त्वमीमांसा की नींव रखता है जहाँ प्रकृति वह है जिसे अधिकार में लिया जा सके, उपयोग किया जा सके, बदला जा सके। दास कोई अन्य मनुष्य नहीं, बल्कि एक अन्य प्रकार का मनुष्य है, जिसकी प्रकृति ही सेवा में समर्पित है। इस अर्थ में, नगर समानों के बीच कोई समझौता नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक श्रेणीबद्धता है जहाँ प्रत्येक तत्त्व अपना स्थान पाता है। जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ उपहार नहीं, बल्कि वैध अर्जन हैं, क्योंकि प्रकृति, संसाधनों के समूह के रूप में, लेने के लिए ही है।

इस ढाँचे में कोई पारस्परिकता संभव नहीं। प्रकृति के अधिकार नहीं हैं, क्योंकि उसकी कोई इच्छा नहीं है। वह विषय नहीं, बल्कि संभावनाओं का भंडार है जिसे साकार किया जाना है। मनुष्य वह है जो साकार करता है। उसकी तर्कशक्ति कोई गुण मात्र नहीं, बल्कि वह सिद्धांत है जो कर्ता को उपकरण से अलग करता है। प्रभुत्व कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है : इसके बिना, नगर ढह जाएगा। और यदि नगर स्वाभाविक है, तो प्रभुत्व भी स्वाभाविक है।

यह स्वर कोई नीति नहीं, बल्कि एक तर्क प्रस्तुत करता है। यह नहीं कहता कि “प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए”, बल्कि यह कहता है : “प्रकृति वह है जिस पर प्रभुत्व स्थापित किया जा सकता है, और यह प्रभुत्व इसलिए वैध है क्योंकि यह स्वाभाविक है।” द्वैतवाद कोई समस्या नहीं, बल्कि एक स्वयंसिद्ध है। मनुष्य और प्रकृति दो भिन्न ध्रुव हैं, और उनका संबंध स्वभावतः असममित है। प्रश्न यह नहीं है कि यह असममिति न्यायसंगत है या नहीं, बल्कि यह कि क्या वह अनिवार्य है। और अरस्तू के लिए, वह अनिवार्य है।

प्रकृति गुणों की प्रणाली के रूप में : संबंध से पहले तत्त्वमीमांसा

इसलिए समाजकेंद्रित पूर्वाग्रह से मुक्त होना आवश्यक था और यह शर्त लगानी थी कि समाजशास्त्रीय वास्तविकताएँ — स्थिर संबंध-तंत्र — विश्लेषणात्मक रूप से तत्त्वमीमांसीय वास्तविकताओं — अस्तित्वों को आरोपित गुणों की प्रणालियों — के अधीन हैं।

Philippe Descola, Par-del nature et culture  — सं. मूल फ़्रेंच ग्रंथ के अनुसार, trad. viasophia

यहाँ प्रकृति कोई वस्तु नहीं, बल्कि गुणों का समूह है। वह मनुष्य के विरोध में नहीं, बल्कि उससे पहले है, वही जिससे संबंध विकसित होते हैं। द्वैतवाद कोई स्वयंसिद्ध नहीं, बल्कि एक पूर्वाग्रह है — वह धारणा जो समाज और प्रकृति को दो अलग क्षेत्र मानती है, जबकि वे एक ही तत्त्वमीमांसा के प्रभाव मात्र हैं।

देस्कोला कोई पारस्परिकता की नीति प्रस्तावित नहीं करता, बल्कि एक पद्धति। वह नहीं कहता कि “प्रकृति के अधिकार हैं”, बल्कि यह कहता है : “जिन संबंध-तंत्रों का हम अवलोकन करते हैं, वे उन गुणों पर निर्भर करते हैं जो हम अस्तित्वों को आरोपित करते हैं।” ये गुण कोई सार नहीं, बल्कि दुनिया को काटने के तरीके हैं। एक वृक्ष कोई जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक ऐसा अस्तित्व है जिसे हम जीवन, विकास, क्रियाशीलता जैसे गुण आरोपित करते हैं — जो बाद में हमारे संबंधों को निर्धारित करते हैं।

इसका अर्थ है कि समाजशास्त्रीय वास्तविकताओं का तत्त्वमीमांसीय वास्तविकताओं के अधीन होना एक उलटफेर है। इसका मतलब है कि नियम, रीति-रिवाज, संस्थाएँ प्राथमिक नहीं, बल्कि व्युत्पन्न हैं। वे श्रेणियाँ नहीं बनाते, बल्कि उनके उत्पाद हैं। इस प्रकार, प्रकृति संस्कृति के विरोध में नहीं, बल्कि उसे संभव बनाती है। वह संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि गुणों का ऐसा ताना-बाना है जो अंतःक्रियाओं को संरचित करता है।

यह प्रस्ताव द्वैतवाद का खंडन नहीं करता, बल्कि उसे स्थानांतरित करता है। यह नहीं कहता कि “मनुष्य और प्रकृति एक हैं”, बल्कि यह कहता है : “मनुष्य और प्रकृति के बीच का भेद अन्य संभावित संरचनाओं में से एक है, और यह संरचना उन गुणों पर निर्भर करती है जो हम अस्तित्वों को आरोपित करते हैं।” प्रकृति कोई अधिकार का विषय नहीं, बल्कि गुणों का ऐसा क्षेत्र है जिसे अधिकार का विषय माना जा सकता है या नहीं। पारस्परिकता कोई नैतिक बाध्यता नहीं, बल्कि एक तत्त्वमीमांसीय संभावना है।

देस्कोला कोई संलयन नहीं, बल्कि विखंडन प्रस्तावित करता है। भेदों का खंडन नहीं, बल्कि उन्हें वहाँ स्थापित करना जहाँ वे उत्पन्न होते हैं : आरोपित गुणों की प्रणालियों में। प्रकृति कोई सहभागी नहीं, बल्कि संबंधों की संभावनाओं का जाल है। और ये संभावनाएँ दी हुई नहीं, बल्कि निर्मित की जाती हैं।

प्रकृति शून्य की खिलावट के रूप में : अहं का विलयन

शून्य के फूल : डोगेन का गेंजोकान यासुतानी रोशी के भाष्य के साथ

Dōgen, dogen-shobogenzo-treasury-true-dharma-eye-tanahashi  — सं. अंग्रेज़ी अनुवाद यासुतानी रोशी के भाष्य के अनुसार, बोस्टन : शंभाला पब्लिकेशन्स, १९९७, trad. viasophia

यहाँ प्रकृति न तो वस्तु है, न गुणों की प्रणाली, बल्कि एक खिलावट है। “प्रकृति” शब्द स्वयं अत्यधिक बोझिल है, अत्यधिक द्वैतवादी। यह देखने वाले और देखा जाने वाले के बीच एक विभाजन मानता है, जबकि डोगेन के लिए यह विभाजन एक भ्रम है। गेंजोकान — यथार्थ की अभिव्यक्ति — कोई प्राप्त करने योग्य अवस्था नहीं, बल्कि स्वयं यथार्थ है, जैसा वह प्रत्येक क्षण में प्रकट होता है।

यह उद्धरण रिक्त है, परंतु यह रिक्तता शून्य नहीं है। वह खिलावट की शर्त है। “शून्य के फूल” कोई वस्तुएँ नहीं, बल्कि घटनाएँ हैं — वे उद्भव जो किसी के नहीं होते, यहाँ तक कि उन्हें देखने वाले के भी नहीं। अहं प्रकृति के सामने कोई विषय नहीं, बल्कि एक ऐसी कल्पना है जो घटनाओं के प्रवाह में मिट जाती है।

यह प्रस्ताव प्रकृति का खंडन नहीं करता, बल्कि उसे पार करता है। यह नहीं कहता कि “प्रकृति एक विषय है”, बल्कि यह कहता है : “विषय और वस्तु के बीच का भेद दृष्टिकोण की भूल है।” द्वैतवाद कोई संबंध का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रत्यक्षण का प्रश्न है। न तो मनुष्य एक ओर है और प्रकृति दूसरी ओर, बल्कि एक ही गति है, एक ही श्वास, जहाँ सब कुछ एक साथ कर्ता और भोक्ता है, देखने वाला और देखा जाने वाला।

डोगेन कोई नीति नहीं, बल्कि एक साधना प्रस्तावित करता है। प्रकृति का सम्मान नहीं, बल्कि उसमें विलीन हो जाना। पारस्परिकता कोई गठबंधन नहीं, बल्कि एकात्मकता है। अहं कोई सहभागी नहीं, बल्कि पार करने योग्य भ्रम है। प्रकृति कोई अन्य नहीं, बल्कि वही स्थान जहाँ स्वयं मिट जाता है।

यह स्वर मनुष्य और प्रकृति को समेटने का प्रयास नहीं करता, बल्कि यह दिखाता है कि उनका विभाजन एक मानसिक रचना है। यह कोई नई तत्त्वमीमांसा नहीं, बल्कि एक अनुभव प्रस्तावित करता है : जहाँ द्वैतवाद मिट जाता है, श्रेणियाँ विलीन हो जाती हैं, विषय और वस्तु एक हो जाते हैं।

द्वैतवाद की सीमा : तीन प्रस्ताव, एक प्रश्न

ये तीन स्वर एक-दूसरे का उत्तर नहीं देते। यहाँ तक कि वे एक-दूसरे का खंडन भी नहीं करते, क्योंकि वे एक ही तल पर नहीं बोलते। एक प्रभुत्व का तर्क स्थापित करता है, दूसरा विखंडन की पद्धति, तीसरा विलयन की साधना। फिर भी, इनके साथ-साथ रखने से एक साझा प्रश्न उठता है : द्वैतवाद की सीमा का प्रश्न।

अरस्तू के लिए, द्वैतवाद एक स्वयंसिद्ध है। मनुष्य और प्रकृति दो भिन्न ध्रुव हैं, और उनका संबंध स्वभावतः असममित है। प्रकृति वह है जिसे अधिकार में लिया जा सके, उपयोग किया जा सके, बदला जा सके। उसके अधिकार नहीं हैं, क्योंकि उसकी कोई इच्छा नहीं है। प्रभुत्व कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है।

देस्कोला के लिए, द्वैतवाद एक पूर्वाग्रह है। वह कोई स्वयंसिद्ध नहीं, बल्कि एक संरचना है, जो अस्तित्वों को आरोपित गुणों पर निर्भर करती है। प्रकृति कोई वस्तु नहीं, बल्कि संबंधों की संभावनाओं का जाल है। पारस्परिकता कोई नैतिक बाध्यता नहीं, बल्कि एक तत्त्वमीमांसीय संभावना है।

डोगेन के लिए, द्वैतवाद एक भ्रम है। वह कोई संबंध का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रत्यक्षण का प्रश्न है। अहं प्रकृति के सामने कोई विषय नहीं, बल्कि एक ऐसी कल्पना है जो घटनाओं के प्रवाह में मिट जाती है। प्रकृति कोई अन्य नहीं, बल्कि वही स्थान जहाँ स्वयं मिट जाता है।

ये तीन प्रस्ताव एक-दूसरे में समाहित नहीं होते। वे एक-दूसरे को पूरा नहीं करते। वे कोई संश्लेषण नहीं बनाते। फिर भी, इनकी टकराहट कुछ और प्रकट करती है : एक सीमा। वह जहाँ द्वैतवाद स्वयं प्रश्न बन जाता है। न कि एक ऐसी भूल जिसे सुधारा जाए, बल्कि एक ऐसी सीमा जिसे लाँघा जाए या मिटाया जाए।

अरस्तू द्वैतवाद को पार करने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे स्थापित करता है। देस्कोला उसे नकारने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे विखंडित करता है। डोगेन उसे समेटने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे विलीन कर देता है। फिर भी, तीनों ही स्थितियों में द्वैतवाद वह है जो दाँव पर लगा है। जिसकी जाँच होती है, जिस पर प्रश्न उठते हैं, जिसे पार किया जाता है।

प्रकृति न तो वस्तु है, न विषय, न प्रवाह। वह इन प्रस्तावों के बीच स्थित है। जो उन्हें संभव बनाती है, और जो उनसे परे है। वह द्वैतवाद की वह सीमा है जहाँ वह स्वयं प्रश्न बन जाता है — वह जो हर उत्तर, हर तत्त्वमीमांसा, हर साधना से पहले आता है।

और शायद यहीं, इस सीमा पर, तीनों स्वर बिना एक हुए मिलते हैं : यह विचार कि प्रकृति वह नहीं है जिसका हम वर्णन करते हैं, बल्कि वह जो वर्णन को संभव बनाती है। वह न तो वश का विषय है, न अधिकार का केंद्र, न विलयन का प्रवाह, बल्कि इन श्रेणियों से परे स्थित है। जो इनसे पहले है, और जो इनसे आगे निकल जाता है।

उद्धृत स्रोत

  • Aristote, La Politique, सं. 3e éd. revue et corrigée, Paris, 1874 (Gallica/BnF), अनु. Jules Barthélemy-Saint-Hilaire.
  • Philippe Descola, Par-del nature et culture, सं. .
  • Dōgen, dogen-shobogenzo-treasury-true-dharma-eye-tanahashi, सं. .