श्रवण एक देहरी के रूप में : मानवों और अमानवों के बीच भाषा और मौन
एक ही ध्यान के दो मार्ग
दो प्रस्ताव श्रवण पर एक-दूसरे के सामने खड़े हैं, बिना विरोध के। एक भाषा से आरंभ होकर उसके प्रतीकात्मक कार्य को उजागर करती है, तो दूसरी संवेदी मौन से शब्दों को उभरने देती है। न तो एक और न ही दूसरी मानवों और अमानवों के बीच के संबंध को संप्रेषण या समझ की समस्या तक सीमित करती है। वे उसकी शर्तों का वर्णन करती हैं, जहाँ शब्द उपकरण नहीं रह जाते, बल्कि देहरी बन जाते हैं।
हृदय का दर्पण
अत्तार एक बिंब प्रस्तुत करते हैं : हृदय को परावर्तक सतह के रूप में। मित्र की सुंदरता — चाहे वह मनुष्य हो या पक्षी — उसे प्राप्त या विश्लेषित नहीं किया जाता। वह तब प्रकट होती है जब हृदय दर्पण बन जाता है।
इसी प्रकार, यदि तू अपने मित्र की सुंदरता को प्रेम करता है, तो जान कि तेरा हृदय उसका दर्पण है।
यहाँ भाषा प्राथमिक नहीं है। वह वह माध्यम है जो रूपों को पार करके उनके मूल तक पहुँचने की अनुमति देती है। शब्द सीधे सुंदरता को इंगित नहीं करते, बल्कि उस ओर दृष्टि मोड़ते हैं जो उसे दृश्यमान बनाता है : हृदय। यह कोई रूपक नहीं, बल्कि एक ठोस प्रस्ताव है। हृदय निष्क्रिय पात्र नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ सुंदरता प्रतिबिंबित होती है — बशर्ते कि ध्यान से उसे चमकाया गया हो।
यह प्रस्ताव मानव और अमानव के बीच भेद नहीं करता। मित्र कोई पक्षी, पर्वत या अन्य मनुष्य हो सकता है। संबंध दूसरे की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि दर्पण की गुणवत्ता पर। इस दृष्टिकोण में भाषा बाधा नहीं, बल्कि उस दर्पण को तैयार करने का साधन है।
लयों की समस्वरता
अब्राम एक भिन्न अनुभव से आरंभ करते हैं : बोध को समकालिकता के रूप में। शरीर दूरस्थ प्रेक्षक नहीं, बल्कि सहभागी है जिसकी लयें वस्तुओं की लयों से मेल खाती हैं।
इस अर्थ में बोध एक समस्वरता या समकालिकता है — मेरी अपनी लयों और वस्तुओं की लयों के बीच, उनके अपने स्वरों और बनावटों के बीच।
यहाँ श्रवण भाषा से पहले आता है। वह प्रतीकात्मक मध्यस्थता नहीं, बल्कि संसार की बनावटों और स्वरों में तल्लीनता है। शब्द बाद में आते हैं, इस प्रारंभिक समस्वरता के विस्तार के रूप में। वे बाहरी सत्य की ओर पुल नहीं, बल्कि इस समस्वरता के प्रतिध्वनि हैं।
अमानव — वृक्ष, नदी, पशु — नामकरण का विषय नहीं, बल्कि इस लय-नृत्य में सहभागी है। बोध निष्क्रिय ग्रहण नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागिता है, जहाँ शरीर अपने परिवेश के साथ तालमेल बिठाता है।
एक साझी देहरी
दोनों प्रस्ताव एक ही सत्य पर नहीं, बल्कि एक ही शर्त पर मिलते हैं : श्रवण को देहरी के रूप में। अत्तार में वह भाषा को पार करके उससे परे पहुँचने का मार्ग है। अब्राम में वह शब्दों से पहले आती है और उन्हें उभरने देती है।
न तो एक और न ही दूसरे संबंध को संप्रेषण की समस्या तक सीमित करते हैं। वे उसकी शर्तों का वर्णन करते हैं : एक हृदय जो दर्पण बन जाता है, एक शरीर जो संसार की लयों से समस्वर हो जाता है। ये शर्तें पार करने के चरण नहीं, बल्कि विकसित करने की प्रवृत्तियाँ हैं।
दोनों ही मामलों में भाषा बाधा नहीं, बल्कि मार्ग है। वह मानव और अमानव को विभाजित नहीं करती, बल्कि उनसे पहले या उनसे परे जो कुछ है, उससे जोड़ती है। श्रवण स्वयं में साध्य नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ संबंध संभव होता है।
उद्धृत स्रोत
- Farîd al-Dîn ʿAttâr, Mantic Uttaïr, ou le Langage des oiseaux, सं. Imprimerie impériale, Paris, 1863, अनु. Joseph Héliodore Garcin de Tassy.
- David Abram, The Spell of the Sensuous, सं. .