जीवंत और वर्तनी : एक ही देखभाल के दो स्वर
जो अभिव्यक्त होता है और जो अपरिवर्तित रहता है
हला स्वर एक ऐसी पुस्तक के इर्द-गिर्द उठता है जो अभिव्यक्ति पाती है। वह उन चीज़ों की बात करता है जो अपनी रक्षा करती हैं, जो मिथकों और व्यवहारों के बीच प्रतिरोध करती हैं। वह एक संघर्ष को शांत करने, दो ऐसी दुनिया के बीच संवाद बहाल करने की बात करता है जिन्हें प्रायः आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है—एक वह जो पुनःवन्यीकरण की खोज में है, और दूसरा वह जो पीढ़ियों से धरती की खेती करता आया है। ग्रंथ यह नहीं बताता कि क्या करना है, न ही यह निर्धारित करता है कि कौन सही है या गलत। वह बस इतना कहता है कि जीवंत के इर्द-गिर्द कुछ अभिव्यक्त होता है, और इस अभिव्यक्ति को सुना जाना चाहिए।
द्वैतवादी मिथकों से परे पुनःवन्यीकरण पुनःवन्यीकरण और ग्रामीण दुनिया के बीच संघर्ष को शांत करना निष्कर्ष : जीवंत जो अपनी रक्षा करता है यह पुस्तक जीवंत के इर्द-गिर्द अभिव्यक्त होती है…
यह स्वर कोई तैयार समाधान प्रस्तुत नहीं करता। वह केवल यह सुझाता है कि जीवंत अपनी जटिलता में वह बिंदु है जिसके चारों ओर सब कुछ पुनर्गठित हो सकता है। वह न जीत की बात करता है, न हार की—बल्कि एक संतुलन की तलाश की, एक ऐसी चिंगारी को फिर से जलाने की जिसे अभी तक पता नहीं कि कैसे। संघर्ष को नकारा नहीं गया है : वह पुनःवन्यीकरण और ग्रामीण दुनिया के बीच मौजूद है, और यही संघर्ष कुछ अलग सोचने की दावत देता है।
दूसरा स्वर अधिक मद्धिम है। वह न संघर्षों की बात करता है, न चिंगारियों की—बल्कि वर्तनी की बात करता है। वह न परिदृश्यों से संवाद करता है, न जीवों से—बल्कि शब्दों से, उनके रूप से, उनके विराम चिह्नों से। वह एक निर्णय की घोषणा करता है : योजक चिह्नों की विविधताओं को मानकीकृत कर दिया गया है, पर बाकी सब—वर्तनी, विराम चिह्न—वैसे ही रहेंगे। कुछ जोड़ा नहीं जाएगा, कुछ घटाया नहीं जाएगा। जो लिखा है, वैसा ही रहेगा, अपनी विशिष्टता में।
योजक चिह्नों की विविधताओं को मानकीकृत किया गया है, पर बाकी सारी वर्तनी और विराम चिह्न पूर्ववत् रहेंगे।
यह स्वर मनवाने की कोशिश नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि इन विवरणों को क्यों संरक्षित करना चाहिए, न ही उनका क्या अर्थ है। वह बस यह देखता है कि कुछ चीज़ें ज्यों की त्यों बनी रहती हैं, मानकीकरण के प्रयासों के बावजूद। योजक चिह्नों को तो एकरूप किया जा सकता है, पर बाकी सब सामान्यीकरण से बच निकलते हैं। यहाँ एक मौन प्रतिरोध है, एक ऐसी निष्ठा जो अपने को कमतर नहीं होने देती।
ये दोनों ग्रंथ एक ही वस्तु की बात नहीं करते। एक जीवंत की बात करता है, दूसरा शब्दों की। एक संघर्षों को शांत करने की बात करता है, तो दूसरा संरक्षित विराम चिह्नों की। फिर भी, दोनों में एक समान सावधानी है—उन चीज़ों के प्रति जो बिना देखे भी बनी रहती हैं।
पहला ग्रंथ जीवंत के इर्द-गिर्द अभिव्यक्त होने वाली चीज़ों को देखने की बात करता है—यानी वे तत्व जो बिना दिखे भी जोड़ते हैं। दूसरा ग्रंथ शब्दों में उन विवरणों को संरक्षित करने की बात करता है जो एकरूपता का प्रतिरोध करते हैं—वे बारीकियाँ भी जो बिना प्रकट हुए जोड़ती हैं। दोनों ही मामलों में, उन चीज़ों पर सावधानी देने की बात है जो पहली नज़र में नहीं दिखतीं।
न तो एक, न दूसरा यह बताता है कि इस सावधानी का क्या करना है। वे कोई कर्म निर्धारित नहीं करते, कोई राह नहीं दिखाते। वे बस उन चीज़ों की ओर इशारा करते हैं जो मौजूद हैं, पर हमेशा ध्यान नहीं पातीं : जीवंत जो अपनी रक्षा करता है, शब्द जो अपरिवर्तित रहते हैं।
शायद यहीं, इस साधारण सुनने के प्रस्ताव में, दोनों स्वर एक हो जाते हैं। एक संघर्षों को शांत करने के लिए उन तत्वों को देखने की दावत देता है जो जोड़ते हैं, तो दूसरा उन विवरणों को संरक्षित करने की बात करता है जो पहले से ही जोड़ते हैं। कोई भी सत्य का दावा नहीं करता। वे बस यह सुझाते हैं कि कुछ चीज़ें देखने—या फिर से देखने—लायक हैं।
उद्धृत स्रोत
- Baptiste Morizot, Raviver les braises du vivant, सं. .
- Djalâl al-Dîn Rûmî, Masnavî, सं. .