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title: "शब्दों का श्वास : शिगेरू कायानो और भाषा के प्रतिरोध की शक्ति"
sousTitre: "जब स्वदेशी आख्यान औपनिवेशिक मिथकों को ध्वस्त करते हैं"
description: "आइनू समुदाय के प्रतिनिधि शिगेरू कायानो अपनी कृति *Our Land Was a Forest* में दिखाते हैं कि भाषा महज़ एक साधन नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति का श्वास है। उनका कार्य प्रतिरोध का आख्यान है, जहाँ हर शब्द उपनिवेशी वर्चस्व के विरुद्ध विमुक्ति का कर्म बनता है—जिन्होंने उनके समुदाय को रूढ़ियों में जकड़ दिया। यह चिंतन है वाणी के पुनर्ग्रहण और स्वदेशी आवाज़ों की सामर्थ्य पर।"
date: 2026-07-27
lang: hi
tradition: ainu
auteurs: ["शिगेरू कायानो"]
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# शब्दों का श्वास : शिगेरू कायानो और भाषा के प्रतिरोध की शक्ति

श

## वह आवाज़ जो भूतों को छिन्न-भिन्न करती है

शिगेरू कायानो के अनुसार, उनके समुदाय को लंबे समय तक एक ऐसी छवि में कैद कर दिया गया जो कल्पना और यात्रा-वृत्तांतों के पन्नों पर मंत्रों की तरह दोहराई जाती रही। समय में जमी ये प्रतिमाएँ उनके लोगों को भूत-प्रेतों में बदल गईं—ऐसे अवशेष जो एक बीत चुके अतीत के गवाह माने गए। परंतु अपनी कृति में कायानो इन भ्रांतियों को मात्र सुधारने तक सीमित नहीं रहते; वे उन्हें चूर-चूर कर देते हैं। वे दिखाते हैं कि ये आख्यान तटस्थ नहीं थे, बल्कि एक संस्कृति, एक भाषा, एक जीवन-दृष्टि को मिटाने का औचित्य गढ़ते थे। उनका कार्य आत्मकथा मात्र नहीं, प्रतिरोध का कर्म है। बोलकर वे अपने समुदाय को दूसरों द्वारा परिभाषित होने से इनकार करते हैं।

शिगेरू कायानो देखते हैं कि ये रूढ़ियाँ—जिन्होंने उनके लोगों को "लुप्तप्राय", "जंगली" या विदेशी कौतुक बना दिया—निरपराध भूलें नहीं थीं। वे एक ऐसी व्यवस्था की उपज थीं जिसने उनकी सत्ता को ही नकारने का प्रयास किया, उन्हें अवशेषों की श्रेणी में धकेल दिया। उनका आख्यान इस हिंसा का जीवंत उत्तर है। यह अमूर्त मान्यता की याचना नहीं, बल्कि ठोस उदाहरणों के ज़रिए यह दिखाना है कि इस स्मृति को ढोते हुए जीना कैसा होता है। विशेषकर भाषा यहाँ केंद्रीय भूमिका निभाती है। वह संवाद का साधन मात्र नहीं, सामूहिक इतिहास का वाहक है—विचार करने और जगत को अनुभव करने की एक विधि।

## आख्यान एक राजनीतिक कर्म है

शिगेरू कायानो बताते हैं कि किस तरह एक ख़ास मोड़ पर उन्हें एक ऐसा मार्ग अपनाने को बाध्य होना पड़ा जिसे उन्होंने स्वयं नहीं चुना था: स्थानीय राजनीति। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि यह बोध था कि वे अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले अंतिम व्यक्ति हैं। उनकी चुनावी जीत, चाहे कितनी ही मामूली क्यों न रही हो, एक प्रतीक थी। वह दिखाती थी कि स्वदेशी उपस्थिति को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता—यहाँ तक कि उन स्थानों पर भी जहाँ उसे व्यवस्थित रूप से मिटा दिया गया था। यह छोटा-सा कर्म एक ऐसी व्यवस्था में दरार डाल रहा था जिसने लंबे समय तक उनके बिना ही काम किया था।

फिर भी उनका संघर्ष केवल इस पद तक सीमित नहीं रहा। शिगेरू कायानो उन अंतरंग क्षणों का भी वर्णन करते हैं जहाँ वाणी एक संप्रेषण और शोक का कर्म बन जाती है। एक अंत्येष्टि के दौरान वे स्वयं को अपनी पूर्वजों की भाषा में शब्द लिखते पाते हैं—न कि किसी अनुष्ठान के पालन में, बल्कि इसलिए कि उन शब्दों में एक ऐसी भावनात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा थी जिसे जापानी भाषा व्यक्त नहीं कर सकती थी। तात्कालिकता में रचे गए ये वाक्य एक मृत स्त्री को श्रद्धांजलि तो थे ही, साथ ही यह भी याद दिलाते थे कि यह भाषा, चाहे कितनी ही संकटग्रस्त क्यों न हो, अभी भी जीवित है। वह अतीत की वस्तु नहीं, वर्तमान में गूँजती रहती है।

## भाषा स्मृति का श्वास है

शिगेरू कायानो एक मूलभूत बात पर ज़ोर देते हैं: भाषा महज़ एक उपकरण नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति का श्वास है। उसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित आख्यान, ज्ञान और जगत को नाम देने की विधियाँ समाहित हैं। जब इस भाषा पर प्रहार होता है, तो मात्र संवाद का साधन ही नहीं मिटता—बल्कि अर्थों का एक संपूर्ण ब्रह्मांड लुप्त हो जाता है। चाहे प्रत्यक्ष हों या छद्म, भाषा को मिटाने के प्रयास जीवितों और उनके पूर्वजों के बीच के संबंध को तोड़ने, स्मृति के हस्तांतरण को असंभव बनाने के लिए होते हैं।

फिर भी इन प्रयासों के बावजूद भाषा बनी रहती है। शिगेरू कायानो इसका एक मार्मिक उदाहरण देते हैं जब वे उस अंत्येष्टि के लिए लिखे गए शब्दों की चर्चा करते हैं। अपूर्ण होते हुए भी वे शब्द एक ऐसी शक्ति से भरे थे जिसे केवल संदर्भ ही उजागर कर सकता था। वे मात्र अनुवाद नहीं थे, बल्कि स्मृति का पुनर्सक्रियण थे। उन्हें उच्चारित कर वे मृतका को श्रद्धांजलि ही नहीं दे रहे थे—वे यह भी याद दिला रहे थे कि यह भाषा, चाहे हाशिए पर ही क्यों न धकेल दी गई हो, कभी समाप्त नहीं हुई। वह मौजूद है, पुनर्जीवित होने को तैयार—बस उसे साँस लेने का अवकाश चाहिए।

## सुनने का निमंत्रण

अपने आख्यान के अंत में शिगेरू कायानो सीधे पाठकों से मुखातिब होते हैं। वे उनसे [दया](https://viasophia.org/lexique/pitie/) या करुणा की माँग नहीं करते, बल्कि [सावधानी](https://viasophia.org/lexique/attention/) से सुनने का आग्रह करते हैं। वे यह स्वीकार करने का निमंत्रण देते हैं कि इस संस्कृति का अस्तित्व केवल उनके समुदाय पर ही निर्भर नहीं, बल्कि उन सभी पर है जो उसे सुनने को तैयार हैं। यह निवेदन याचना नहीं, ज़िम्मेदारी का आह्वान है। यह याद दिलाता है कि विऔपनिवेशीकरण केवल कानूनों या नीतियों से नहीं, बल्कि दृष्टि के परिवर्तन और सक्रिय श्रवण से होता है।

इस अर्थ में उनकी कृति उन लोगों के सामने एक दर्पण रखती है जिन्होंने लंबे समय से आइनुओं को मात्र एक स्मृति मान लिया था। वह दिखाती है कि यह संस्कृति मृत नहीं, निरंतर गतिशील है—निरंतर स्वयं को पुनर्निर्मित करती हुई। और भाषा, महज़ एक साधन से कहीं अधिक, वह सूत्र है जो जीवितों को उनके पूर्वजों से और पूर्वजों को आने वाली पीढ़ियों से जोड़ता है।

  
    Dower author of War Without Mercy “The Ainu people of Japan have long haunted travelogue and anthropology textbooks alike in the guise of ‘the vanishing Ainu,’ ‘the hairy Ainu,’ and ‘the aborigines of Japan.’ In this slim volume, skillfully translated by the able motherdaughter team of Kyoko and Lili Selden, Kayano Shigeru banishes the mythical Ainu who never were.
  
  Les Aïnous du Japon ont longtemps hanté les récits de voyage et les manuels d’anthropologie sous les traits des « Aïnous en voie de disparition », des « Aïnous velus » et des « aborigènes du Japon ». Dans ce mince ouvrage, traduit avec habileté par l’efficace duo mère-fille Kyoko et Lili Selden, Kayano Shigeru dissipe le mythe des Aïnous qui n’ont jamais existé.

*[Une voix de l'intérieur]* आइनू समुदाय के सदस्य शिगेरू कायानो सांस्कृतिक प्रतिरोध के साक्षी और सक्रिय योद्धा हैं। उनका आख्यान *Our Land Was a Forest* स्वदेशी वाणी के पुनर्ग्रहण की चुनौतियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है। उपरोक्त उद्धरण, पुस्तक की भूमिका से लिया गया, यह दर्शाता है कि किस प्रकार रूढ़ियों ने उनके समुदाय की जीवंत वास्तविकता को मिटाने का काम किया। फ़्रेंच अनुवाद मूल पाठ की आत्मा के अनुरूप है।

## स्रोत

- Shigeru Kayano, *Our Land Was a Forest* — Sarah M. Strong, Ainu Spirits Singing, University of Hawai'i Press, 2011 (manuscrit de 1922, publié en 1923), अनु. Sarah M. Strong (de l'ainu et du japonais vers l'anglais) ; rendu français maison


प्रमाणिक स्रोत : https://viasophia.org/hi/reenchanter/2026-07-27-souffle-mots-shigeru-kayano-langue/
