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title: "देवता 'मैं' गाता है"
sousTitre: "चिरी युकिए द्वारा लिपिबद्ध आइनू यूकार में महाकाव्य पशुओं के बारे में नहीं है : वह उल्लू, मेंढक, श्वेतभक्षी ही है जो स्वयं अपनी मनुष्य लोक की यात्रा का वर्णन करता है, प्रथम पुरुष में, 'मैं' कहकर।"
description: "यूकार : आइनू का गाया हुआ वह महाकाव्य जिसमें देवता-पशु — उल्लू, मेंढक, श्वेतभक्षी — स्वयं को प्रथम पुरुष में गाता है, उसका स्वर ही उसका प्रतिध्वनित होता है। गान की संरचना ही सक्रिय ब्रह्मांड विज्ञान है।"
date: 2026-06-24
lang: hi
tradition: ainu
auteurs: ["चिरी युकिए"]
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# देवता 'मैं' गाता है

एक मनुष्य चूल्हे के पास पीठ के बल लेटा हुआ है, वह अपनी छाती पर हाथ से ताल दे रहा है, और एक स्वर उठता है। वह कहता है "मैं"। पर यह "मैं" उसका नहीं है : यह एक मेंढक का है, एक मछली पकड़ने वाले उल्लू का, एक श्वेतभक्षी का। उन गीतों में जिन्हें चिरी युकिए ने उन्नीस वर्ष की आयु में 1922 में आइनू से लिपिबद्ध किया, वक्ता लगभग कभी मनुष्य नहीं होता। शीर्षक बिना किसी संकोच के घोषणा करते हैं : *उल्लू स्वयं पर गाता है*, *मेंढक स्वयं पर गाती है*। जो बोलता है, वह पशु है — और वह पशु देवता है।

  
    “Toororo hanrok, hanrok!” One day I was spending time amusing myself hop-hopping where the dense weeds grow, when I looked and there was a house […] In this way I am now about to die a mean death, an awful death, and so you frogs who come after me, make sure you do not play evil tricks on the humans. With these words the frog with the bloated belly died.
  
  « टूरोरो हनरोक, हनरोक ! » एक दिन जब मैं उछल-कूद कर रहा था, हप-हप, जहाँ घास घनी उगी थी, मैंने देखा : वहाँ एक घर था […] अब मैं निकृष्ट मृत्यु मरने जा रहा हूँ, भयानक मृत्यु मरने जा रहा हूँ ; और तुम, जो मेंढक मेरे बाद आएँगी, मनुष्यों के साथ बुरे मज़ाक मत करना। इन शब्दों के साथ, फूले पेट वाली मेंढक मर गई।

*[Toororo hanrok, hanrok]* यह पद — *साकेह* — गीत की प्रत्येक पंक्ति के बीच लौटता है। यह अलंकरण नहीं है : यह बोलने वाले देवता की अपनी ध्वनि है, उसकी ध्वनिमय पहचान। हर कामुई की अपनी अलग होती है ; उसे पहचानना ही यह जानना है कि कौन गा रहा है।

सब कुछ व्याकरणिक पुरुष में निहित है। मेंढक अपनी ही शरारत, अपनी ही सज़ा, यहाँ तक कि अपनी ही मृत्यु का वर्णन करती है : « अब मैं मरने जा रहा हूँ »। "मैं" अंतिम साँस तक बना रहता है। अंत में केवल एक पंक्ति तृतीय पुरुष में चली जाती है — *इन शब्दों के साथ, फूले पेट वाली मेंढक मर गई* —, मानो मानवीय स्वर फिर से नियंत्रण ले लेता है और गीत को समाप्त करता है। बाकी सब कुछ पशु का है। यही *यूकार* है : पशु के *बारे में* कोई कथा नहीं, बल्कि पशु स्वयं को कहता है।

विशेषज्ञ डोनाल्ड फिलिप्पी, जिन्होंने इन महाकाव्यों का संदर्भ अनुवाद स्थापित किया है, इस नियम को — बाहरी दृष्टि से, परंतु उन ग्रंथों के आधार पर जिन्हें आइनू स्वयं ने स्थिर किया — इस प्रकार व्यक्त करते हैं : पूरा गीत *« एक ही वक्ता द्वारा कहा गया एकालाप »* है, जिसमें न कोई म्यूज़, न कोई गान का देवता बीच में आता है। और *कामुई यूकार* में यह वक्ता स्वयं देवता होता है : वह प्रकट होता है, बोलता है, और वर्णन उसके दृष्टिकोण से कभी नहीं हटता। रूप विश्वास को चित्रित नहीं करता ; वह उसे साकार करता है। उल्लू को बोलने का अवसर देने के लिए ऐसी व्याकरण की आवश्यकता थी जिसमें उल्लू "मैं" कह सके।

चिरी युकिए से बेहतर यह कोई नहीं जानता था। अपने लोगों की मौखिक साहित्य को लिपिबद्ध करने वाली पहली आइनू — बाहरी लोकगीतकार नहीं —, वह अपनी भूमिका में देवताओं *के बारे में* कहानियाँ नहीं दर्ज करती : वह स्वरों को बचाती है।

  
    I who was born an Ainu and grew up with the Ainu language have written down with my halting brush just one or two very short pieces from among the sundry tales that our ancestors enjoyed relating on rainy evenings and snowy nights, whenever they had time to get together.
  
  मैं आइनू जन्मी और आइनू भाषा में पली-बढ़ी हूँ, मैंने अपने पूर्वजों द्वारा सुनाई जाने वाली कुछ अत्यंत संक्षिप्त कथाओं को अपनी झिझकती कलम से लिखा है, जिन्हें वे वर्षा की शामों और हिम की रातों में सुनाया करते थे, जब भी उन्हें एकत्र होने का समय मिलता।

उसकी "झिझकती कलम" एक ऐसी भाषा को लैटिन अक्षरों में लिखती है जिसका कोई वर्णमाला नहीं था, उन गीतों को स्थिर करने के लिए जहाँ देवता अपना मुँह नहीं छोड़ता। यह कार्य सटीक है : एक *यूकार* को लिपिबद्ध करना मेंढक के बारे में कहना नहीं है, बल्कि उसे फिर से बोलने का अवसर देना है।

यहीं वह सीमा है जिसे हर तुलना से पहले समझना आवश्यक है। हम भी पशुओं को बोलने का अवसर देते हैं — नीति कथाओं में। परंतु ईसप या ला फोंतेन में मानवीय कवि पशु को अपनी आवाज़ उधार देता है *मनुष्य के बारे में* बोलने के लिए : कौआ और लोमड़ी मुखौटे हैं, कथा का विषय हम ही रहते हैं, और पशु केवल हमारे दोषों का आईना होता है। *यूकार* इसके विपरीत करता है। मनुष्य चुप रहता है और सुनता है ; पशु अपनी आवाज़ रखता है ; और जो वह कहता है, वह उसका अपना संसार है — उसकी यात्रा, उसकी शरारत, उसकी मृत्यु, यहाँ तक कि अपनी जाति के लिए छोड़ा गया उसका नियम : *मनुष्यों के साथ बुरे मज़ाक मत करना*। आईना पलट गया है। अब पशु हमें हमारी छवि नहीं दिखाता : वह हमें देखता है, और हमें देखते हुए वह नीचे उतरकर कहने का निर्णय लेता है। निचोकुआन का उल्लू, चीड़ की डाल पर पूर्णिमा के सामने, अपनी गोल आँखें हमारी ओर घुमाता है। प्रश्न यह नहीं है कि वह क्या है। प्रश्न यह है कि जब उसका "मैं" गाने की बारी आएगी, तो वह क्या कहेगा।

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**À lire aussi**

- [Kamuy](https://viasophia.org/reenchanter/2026-06-09-kamuy-chiri-yukie/)
- [Le don qui circule](https://viasophia.org/reenchanter/2026-06-13-minidewak-le-don/)
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## स्रोत

- Chiri Yukie, *Ainu shin'yōshū (Recueil des chants divins ainu)* — Sarah M. Strong, Ainu Spirits Singing, University of Hawai'i Press, 2011 (manuscrit de 1922), अनु. Sarah M. Strong (de l'ainu et du japonais vers l'anglais) ; rendu français maison
- Donald L. Philippi, *Songs of Gods, Songs of Humans: The Epic Tradition of the Ainu* — University of Tokyo Press / Princeton University Press, 1979, अनु. Donald L. Philippi (regard extérieur) ; rendu français maison


प्रमाणिक स्रोत : https://viasophia.org/hi/reenchanter/2026-06-24-le-dieu-chante-je/
